सोमवार, 19 जून 2017

विरासत
तब लुप्त् नहीं होगी कोई सरस्वती
सुरेन्द्र बांसल

हमारी गैर जिम्मेदाराना और संवेदनशील जीवन शैली की वजह से नदियांे समेत तमाम प्राकृतिक जलस्त्रोत न केवल दूषित होते जा रहे हैं । 
बल्कि भौतिक लोलुपता के कारण दम भी तोड़ रहे हैं । हमारे सामने ऐसी विकट स्थितियाँ हैं उन्हें देखते हुए लगता है कि प्राकृतिक जल संसाधनों से और खिलवाड़ सहन नहीं कर सकते हैं ।  
नदियाँ हमारे जनमानस की स्वच्छता और निर्मलता का प्रतीक हैं, लेकिन आज हमारी गैर जिम्मेदाराना और असंवेदनशील जीवन शैली के  कारण नदियांे समेत तमाम प्राकृतिक जलस्त्रोत न केवल दूषित होते जा रहे हैं बल्कि भौतिक लोलुपता के कारण दम भी तोड़ रहे हैं । अगर हम जल संस्कृति के वारिस रहना चाहते हैं तो हमें आज से और अभी से नदियों, तालाबों, जोहड़ों, डबरों, बावड़ियों, कुओं और अन्य जलस्त्रोतों को पुन: सजीव करने के लिए युद्ध स्तर पर जुटना होगा, क्योंकि नदियों को खत्म करने का मतलब है धीरे-धीरे सभ्यताओं और संस्कृतियों को खत्म करना । व्यक्ति, समाज और सरकार सभी को अपना दायित्व समझकर जलस्त्रोतों और नदियों को बचाने की मुहिम में जुटना होगा । तभी हम काल के अभिशाप से बचेंगे, क्योंकि अगर हम आज नहीं चेते तो कल हमें अभिशाप देगा । 
नदियों से ओत-प्रोत जैसा भूगोल अपने देश का है वैसा विश्व में कोई दूसरा नहीं । हमारे उत्तरी क्षेत्र को गंगा और यमुना ने ही संसार का सबसे विस्तृत उर्वर क्षेत्र बनाया है। पश्चिम अपनी पांच नदियों के कारण पंचनद प्रदेश कहलाता है । ये पांचों नदियाँ वैदिक और पौराणिक काल की हैं। इनमें से सतलुज नदी वेदों-पुराणों में जहाँ शतद्रू के नाम से विख्यात थी, वहीं ब्यास बिपाशा के नाम से जानी जाती थी । नर्मदा, महानदी, ताप्ति और सोन नदियाँ जहाँ मध्य भारत का गौरव हैं,वहीं दक्षिण भारत कृष्णा, कावेरी और गोदावरी के कारण धन-धन्य से भरपूर रहा है । 
उतर-पूर्व भारत में ब्रह्मपुत्र और तीस्ता के उपकारों को भला कौन भूल सकता है । इन सबके बीच भी सैकड़ों नदियाँ ऐसी हैं जो सदियों से देश के जन-गण के लिए प्राकृतिक नीति आयोग का काम करती आ रही    हैं । न तो हम भगवान राम के जीवन चरित की साक्षी सरयू को भूल सकते हैं न गौतम बुद्ध, महावीर के बिहार में विहार करती गंडक नदी को भूल सकते हैं और न ही लाखों भारतीयों के आध्यात्मिक समागम कुंभ को अनदेखा कर सकते हैं ।  
पुण्यदायिनी इन नदियों का ही प्रताप है कि जितनी विविधता भरी और उपजाऊ  भूमि भारत में है, उतनी दुनिया मंे और कहीं नहीं । लेकिन अफसोस की बात है कि पिछले दो सौ वर्षों की अंग्रेजी शिक्षा और साठ  वर्षों की वामपंथी कुशिक्षा ने हमारे लहलहाते काल-बोध को कमजोर कर दिया है । अगर हमारे राजनेताओं की जमात ने अंग्रेजी शिक्षा के  कारण देश के भूगोल को उपेक्षित न बनाया होता तो आज पाठ्यक्रमों से मिट चुके देश को बच्च्े ठीक से पढ़ पाते । 
वे जान पाते कि अपने देश की नदियों और पहाड़ों के कितने सुंदर नाम और कितना महत्व था । हमारे बच्च्े अपने पुरखों की कमाई नेकियांे से रू-ब-रू होते । लेकिन भारत का मूल मिटाने वाली वोट जुटाऊ राजनीति और मार्क्सवादी अफीम के नशे में धुत बुद्धिजीवियों ने योजनाबद्ध तरीके से स्कूली पाठ्यक्रमों से देश लगभग मिटा ही डाला है ।
हमारा वैदिक और पौराणिक साहित्य नदियों की स्तुतियों और पूजा-अर्चना से भरा पड़ा है। प्रत्येक नदी के स्त्रोत हैं, आरती-पूजा का विधान है । लेकिन इन्हें बचाए रखने का विधान कहीं खो गया लगता है तभी तो सरस्वती लुप्त हुई और कई `सरस्वतियां` विलुप्ति की कगार पर हैं । प्राकृतिक जलस्त्रोतों और प्रकृति को मात्र भौतिक दृष्टि से देखना पश्चिम का भोगवादी नजरिया है। हमारी नदियों को किसी भौतिक ऊहापोह में नहीं बांधा जा सकता ।
आज हमने अपने सारे सरल काम जटिल कर लिए हैं । हम अपने अनेकानेक सामाजिक दायित्व बिसरा चुके हैं । नदियों के प्रति भी हमारे कर्तव्य बाधित और भ्रमित हो चले   हैं । लेकिन जिस दौर में केवल अधिकारों की छीना-झपटी मची हो, उस दौर में कर्तव्यों की चिंता भला किसे है ! हमारे पुरखों ने नदियों से जुड़े विधि-विधान अपनी जीवनचर्या से जोड़ रखे थे । लेकिन उद्योग बनते सियासी तंत्र में अधिकार हमारे कर्तव्य तुम्हारे का खेल चल पड़ा है । प्राकृतिक संसाधनों की लूट-खसोट ही सरकारों की मुख्य नीतियों में शुमार हो चुकी है । 
हालांकि इसी देश में कुछ बरस पहले ऋषि विनोबा ने कहा था `सबै भूमि गोपाल की, नहीं किसी की मालकी`। लेकिन इस बात को आज कौन समझ रहा है। इसी बीच `नमामि गंगे` के संकल्प के साथ हरियाणा सरकार को अपने तमाम जलस्त्रोतों और छोटी-मोटी सभी नदियों को निर्मल बनाने की सार्थक और व्यावहारिक योजना बनानी चाहिए । जब तब जलस्त्रोतों को बचाने के ऐसे अभियान व्यावहारिक नहीं होंगे तब तक `सरस्वतियां` यों हीं लुप्त होती रहेंगी । 
सरस्वती का उद्गम स्थल आदिबद्री माना जाता है । लेकिन हैरानी की बात है कि इस क्षेत्र में प्लाईवुड उद्योेग धड़ल्ले से जंगलों पर कुलाड़ी चला रहा हैं लगभग चार सौ लाइसेंस पहले से जारी हैं अभी दो सौ लाइसेंस और देने की बात चल रही है। इसका दुष्परिणाम यह होगा कि बचाखुचा भूजल भी सिमटता  जाएगा । इसमें कोई संदेह नहीं कि जीवन को चलाने के लिए कारोबार भी फलने-फूलने चाहिए लेकिन जिम्मेदारी और नियमों के साथ क्या ऐसा संभव नहीं कि प्रत्येक प्लाईवुड लाइसेंस धारक प्रतिवर्ष अपना लाइसेंस रिन्यू करवाने से पूर्व कम से कम पांच सौ पेड़ अवश्य लगाए ? ऐसा संभव है । सरकार को ऐसे नियमों को संभव बनाना चाहिए ताकि भूजल स्त्रोतों का खजाना बचा रहे । यमुनानगर के पूरे क्षेत्र में सफेदा और पोपलर वृक्ष अपार संख्या में रोपे गए हैं। प्लाईवुड के लिए तो ये वृक्ष काम आ सकते हैंलेकिन भूजल स्तर को ये कितना नुकसान देंगे इसका अंदाजा होते हुए भी आंखें मंूदना बेहद घातक होगा ।
हरियाणा आज अपनी भूजल संपदा के मामले में बहुत बड़े संकट के मुहाने पर खड़ा है। हरियाणा में कुल जलसंभर क्षेत्र १०८ हैं,जिनमें से ८२ डार्क जोन में बदल चुके हैं। मुख्यमंत्री श्री मनोहर लाल के अपने क्षेत्र करनाल के सभी छह ब्लॉक डार्क जोन में बदल चुके हैं । हरियाणा देश का एकमात्र राज्य है जिसमें मात्र छह फीसद वन बचे हैं । जिस प्रदेश में वन इतने कम हों वहाँ कभी भी अकाल की स्थिति पैदा हो सकती है। हरियाणा की नई सरकार को नए सपनों के साथ प्रदेश की शुष्क पर्यावरणीय स्थिति को श्रद्धा से सींचना होगा । सभी नदियों के किनारों पर युद्ध स्तर पर देशज पेड़ रोपने होंगे । पेड़ों से बड़ा जल संरक्षक कोई नहीं होता ।
ऐसे हालात में भी हरियाणा सरकार सौभाग्यशाली है कि प्रदेश में सरस्वती के प्रकट होने की खबरें यदा-कदा आ रही हैं, लेकिन सरकार को मात्र नारियल फोड़ कर, चार चावल चढ़ाकर और तिलक लगाकर अपने कर्तव्य से पल्ला नहीं झाड़ना होगा बल्कि उसे सरस्वती के ऐसे स्त्रोत से प्रेरणा लेकर प्रदेश के सभी पुरातन जल स्त्रोत की सार-संभाल का जिम्मा उठाना होगा । सरस्वती बोर्ड की सार्थकता तभी है जब हरियाणा की नदियां, तालाब, जोहड़, डबरे, बावड़ियों और कुएं संभाले   जाएं । 
अन्यथा देखा जाता रहा है कि ऐसी संस्थाएँ कुछ ज्ञात-अज्ञात कार्यकर्ताओं या परिचितों के पेट की भेंट चढ़ जाती हैं । अगर प्रदेश सरकार पर्यावरण प्रेमियों, जल का महत्व समझने वालों, पंचायतों और युवकों को साथ लेकर अपने जल स्त्रोतों को बचाने में सफल होती है तो यकीन मानें इससे न केवल दिन-प्रतिदिन विलुप्ति की कंदरा की ओर बढ़ती यमुना बच पाएगी बल्कि कोई `सरस्वती` कभी लुप्त नहीं  होगी । प्रदेश में फूटे सरस्वती के स्त्रोत से प्रेरणा लेकर हम सब सुखद भविष्य की रचना में जुुटें ।

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